2 line shayari online

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2 line shayari online सुकून की बातमत कर ऐ दोस्त.. बचपन वाला ‘इतवार’ जाने क्यूँ अब नहीं आता। मैंने कहा बहुत प्यार आता है तुम पर.. वो मुस्कुरा कर बोले और तुम्हे आता ही क्या है। अपनी ईन नशीली निगाहों को, जरा झुका दीजिए जनाब… मेरे मजहब में नशा हराम है… चुभता तो बहुत कुछ मुझको भी है तीर की तरह, मगर ख़ामोश रहेता हूँ, अपनी तक़दीर की तरह| देखते हैं अब क्या मुकाम आता है साहेब, सूखे पत्ते को इश्क़ हुआ है बहती हवा से..!! मैने जो पुछा उनसे…

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